पश्चिमी सिंहभूम: कच्चे कोकून से सिल्क हब बनने की ओर
owards Becoming a Silk Hub—From Raw Cocoons
चाईबासा। owards Becoming a Silk Hub—From Raw Cocoons, पश्चिमी सिंहभूम जिला अब केवल कच्चे कोकून का उत्पादक बनकर नहीं रहेगा, बल्कि सिल्क प्रोसेसिंग और टेक्सटाइल हब के रूप में अपनी पहचान बनाएगा।
उद्योग विभाग और रेशम निदेशालय द्वारा आयोजित क्षेत्रीय कार्यशाला में उपायुक्त (DC) चंदन कुमार ने जिले के सिल्क उद्योग को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए 20 करोड़ के निवेश का रोडमैप पेश किया।
कच्चा माल हमारा, ब्रांडिंग दूसरों की
उपायुक्त ने चिंता जताई कि सिंहभूम में देश का सबसे उच्च गुणवत्ता वाला कोकून पैदा होता है, लेकिन इसका असली मुनाफा भागलपुर, दुमका और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य उठा रहे हैं।
उन्होंने गणित समझाते हुए कहा कि यहां का किसान कोकून मात्र 5.65 रुपये में बेच देता है, जबकि उसी से बनी रेशमी साड़ी बाजार में 20 से 25 हजार रुपये तक बिकती है। इस वैल्यू गैप को भरने के लिए अब स्थानीय स्तर पर ही प्रसंस्करण (Processing) और ब्रांडिंग पर जोर दिया जाएगा।
क्लस्टर आधारित विकास की योजना
डीसी ने बताया कि जिले के विभिन्न क्षेत्रों में छोटे-छोटे प्रोसेसिंग सेंटर स्थापित किए जाएंगे:
- स्थानीय इकाइयां: मनोहरपुर, सारंडा, मझगांव और बंदगांव जैसे क्षेत्रों में 4-4 करोड़ की लागत से मशीनें लगाकर सिल्क सूत तैयार किया जाएगा।
- केंद्रीय यूनिट: जिला मुख्यालय में 20 करोड़ की लागत से बड़ी मशीनें स्थापित होंगी, जहां सूत से कपड़ा (साड़ी, शॉल, तौलिया) निर्माण होगा।
- महिला सशक्तिकरण: इस पूरी शृंखला से 100 से 200 महिला स्वयं सहायता समूहों को जोड़ा जाएगा और उन्हें विशेष प्रशिक्षण देकर रोजगार से जोड़ा जाएगा
भविष्य की तैयारी
उपायुक्त ने स्पष्ट किया कि यह कोई तात्कालिक योजना नहीं है, बल्कि एक दीर्घकालिक ठोस तैयारी है, जिसके परिणाम अगले एक वर्ष या उससे अधिक समय में दिखने लगेंगे।
कार्यक्रम में 400 तसर रेशम कृषकों ने भाग लिया, जहां उत्कृष्ट कार्य करने वाले किसानों को सम्मानित भी किया गया। इस अवसर पर डीडीसी उत्कर्ष कुमार, सेंट्रल सिल्क बोर्ड के वैज्ञानिक और कई तकनीकी पदाधिकारी मौजूद रहे।